श्लोक - १५५

शत्रूणामपकर्तारं सन्तो न बहुकुर्वते ।
अरिष्वपि क्षमावन्तं स्वर्णवत् हृदि कुर्वते ॥
Tamil Transliteration
Oruththaarai Ondraaka Vaiyaare Vaippar
Poruththaaraip Ponpor Podhindhu.
| Section | भाग–१: धर्मकाण्ड |
|---|---|
| Chapter Group | अधिकार 011 to 020 |
| chapter | क्षमा |